आज मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर, लाखों श्रद्धालु महाकुंभ 2025 के पहले अमृत स्नान के लिए प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर एकत्रित हुए। इस पवित्र आयोजन में सबसे पहले नागा साधुओं ने स्नान किया, जिसके बाद आम श्रद्धालुओं को संगम में डुबकी लगाने का अवसर मिला। यह परंपरा भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का अद्भुत उदाहरण है। आइए जानते हैं इस परंपरा और इसके पीछे की गहराई को।

महाकुंभ 2025 का पहला अमृत स्नान
मकर संक्रांति पर महाकुंभ मेले का पहला शाही स्नान एक ऐसा आयोजन है जो लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। इस अवसर पर 13 प्रमुख अखाड़ों के साधु-संतों ने सबसे पहले संगम में स्नान किया। इन अखाड़ों को तीन प्रमुख समूहों में बांटा गया है:
- उदासीन अखाड़े: नया और बड़ा उदासीन।
- वैरागी अखाड़े (वैष्णव परंपरा): निर्मोही, दिगंबर अनी, और निर्वाणी अनी।
- संन्यासी अखाड़े (शैव परंपरा): महानिर्वाणी, अटल, निरंजनी, आनंद, भैरव, आह्वान और अग्नि।
इन अखाड़ों के साधु-संत अपनी परंपरा और भक्ति के कारण कुंभ मेले के सबसे प्रमुख आकर्षण माने जाते हैं।
नागा साधु सबसे पहले स्नान क्यों करते हैं?
नागा साधुओं को अमृत स्नान का पहला अधिकार देने की परंपरा लगभग आठवीं शताब्दी से चली आ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नागा साधु भगवान शिव के शिष्य माने जाते हैं। उनकी कठोर तपस्या, भक्ति और संसार से विरक्ति के कारण उन्हें यह विशेषाधिकार दिया जाता है।
इतिहासकारों के अनुसार, नौवीं से अठारहवीं शताब्दी के बीच अखाड़ों के द्वारा आयोजित समारोहों में अमृत स्नान का महत्व बढ़ा। तब से यह सुनिश्चित किया गया कि नागा साधु सबसे पहले स्नान करेंगे। यह परंपरा उनकी आध्यात्मिक शक्ति और धार्मिक महत्व को दर्शाती है।
अमृत की बूंदों की कहानी
धार्मिक ग्रंथों में वर्णित समुद्र मंथन की कथा के अनुसार, जब देवताओं और दानवों के बीच अमृत कलश की रक्षा के लिए संघर्ष हुआ, तब अमृत की चार बूंदें पृथ्वी पर गिरीं। ये स्थान हैं:
- प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)
- उज्जैन (मध्य प्रदेश)
- हरिद्वार (उत्तराखंड)
- नासिक (महाराष्ट्र)
इन्हीं स्थानों पर कुंभ और महाकुंभ मेलों का आयोजन किया जाता है। यह आयोजन भारतीय धार्मिक परंपराओं का प्रतीक है।
नागा साधुओं का महत्व
नागा साधु भारतीय धर्म और संस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा हैं। उनका नग्न रूप, भस्म से सना शरीर और जटाजूट उनकी कठोर तपस्या और संसार से विरक्ति को दर्शाता है। ये भगवान शिव के प्रति अपनी पूर्ण समर्पण भावना के लिए प्रसिद्ध हैं।
महाकुंभ मेले में नागा साधुओं का पहला स्नान न केवल उनकी आध्यात्मिक शक्ति को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि धर्म और तपस्या के बल पर जीवन के पापों से मुक्ति संभव है। उनके स्नान के बाद आम श्रद्धालु संगम में स्नान करते हैं, जिससे यह परंपरा और भी पवित्र हो जाती है।
निष्कर्ष
मकर संक्रांति और महाकुंभ मेले का यह आयोजन भारतीय संस्कृति और धर्म का प्रतीक है। नागा साधुओं का पहला स्नान उनकी तपस्या, भक्ति और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक है। लाखों श्रद्धालुओं का संगम में स्नान करना इस आयोजन की भव्यता और धार्मिक महत्व को और बढ़ा देता है। यह परंपरा न केवल आस्था और भक्ति का संगम है, बल्कि भारतीय संस्कृति की गहराई को भी दर्शाती है।